Chudel ki sacchi kahani || चुड़ेल की सच्ची कहानी

Chudel ki sacchi kahani || चुड़ेल की सच्ची कहानी

 चुड़ेल की सच्ची कहानी

 एक दिन की बात हैं, ठंड का समय था घना कोहरछाया था सारे लोग जल्दी कार्यालय का काम खत्म करके घर की तरफ निकल रहे थे । नाना जी उस समय के बड़े अधिकारियों में से एक थे । वे उस समय के उच्चवर्ग के लोगों में एक अमीन का काम करते थे । रोज की तरह ही उस दिन काम खत्म होने के बाद घर के लिए अपनी गाड़ी से रवाना होने लगे , रास्ते में उन्हे हाट से कुछ समान भी लेना था तो वे और साथियों से अलग हो गये , उन्होने घर की कुछ जरूरत के समान लिए और गाड़ी आगे बढ़ा दी ।आगे जाने पर उन्हे  मछली बाजार दिखा और बो मछली खरीदने के लिए रुक गई ।ताजी मछलियाँ लेने और देखने मे टाइम ज़्यादा ही गुजर गया, उनकी जब अपनी घड़ी पर नज़र गई तो उन्हें आभास हुआ की आज तो घर जाने मे बहुत देर हो जाएगी और ये सब लेकर घर पहुचने मे काफ़ी समय लग जाएगा । फिर यही

सब सोच कर उन्होने सोचा कि क्यू ना जंगल के रास्ते से निकला जाए तो जल्दी पहुँच जाउँगा। तो उन्होने अपना रास्ता बदला और जंगल की तरफ से अपनी गाड़ी को घुमा लिया । समय रात ११ बज चुका था गाड़ी तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहा था तभी अचनाक तेज ब्रेक के साथ गाड़ी को रोकना पड़ा ।उनकी गाड़ी के आगे एक औरत जोर जोर  से रो रही थी।उन्होने सोचा इस वीराने जंगल मे ये औरत क्या कर रही हैं उन्हे लगा की कोई मजदूर की पत्नी होगी जो नाराज़ होकर घर छोड़ कर जंगल मे भाग आई हैं, तो उन्होने उससे पूछा की यहाँ जंगल मे तुम क्या कर रही हो? लकिन उसने कोई जवाब न देकर और जोर जोर से रोने लगी। सारे जंगल मे उसकी हूँ हूँ सी सिसकियाँ गूँज रही थी। फिर नाना जी ने पूछा तुम्हारा घर कहाँ हैं? लेकिन वो कुछ भी ना बोली।तब नाना जी ने कहा की आज चलो मेरे घर मे रहना सुबह अपने घर चली जाना ये जंगल बहुत सारे जंगली जानवर से भरा हे, रात भर यहाँ मत रूको चलो आज मेरे घर मे सब के लिए खाना बना देना और कल सुबह अपने घर चली जाना। उसने ये सुना तो झट से तैयार हो गई । और गाड़ी मे पीछे की सीट पर बैठ गई। सिर मे बड़ा सा घूँघट डालने की वजह से उसका चेहरा छुपा हुआ था । कुछ ही देर मे गाड़ी घर के दरवाजे पे थी। घर के लोग कब से उनकी राह देख रहे थे,गाड़ी रुकते ही पापा ने पूछा आज तो बहुत देर हो गई और सारे लोग आभी चुके हैं ,तब उन्होने सारी बातें अपनी माँ को बताई और कहा की आज खाना इससे बनवा लो कल सुबह ये अपने घर चली जाएगी। इतनी रात को बेचारी जंगल मे कहा भटकती । इसलिए मैं ले आया ।पर पापा को कुछ संदेह हो रहा था की कहीं चोर तो नहीं हे रात को सोने के बाद या खाना बनाते समय कहीं घर के सामान ही चुरा कर ना ले जाए ।पर बेटे की बात को कैसे माना करती । उन्होने उस औरत को कहा देखो आज तो मैं रख ले रही

हूँ लेकिन कल सुबह होते ही यहाँ से चली जाना।और जाओ रसोई मे ये समान उठा कर ले जाओ और खाना बना दो ।उसने फिर से जवाब नहीं दिया ।बस हूँ हूँ हूँ की आवाज बाहर आयी ।और वो सारा सामान लेकर माँ के पीछे पीछे चलने लगा रसोई मे सारा सामान रखवा कर माता जी ने उसे खाना जल्दी बनाने की बोलकर  सबकुछ बता दिया और वहाँ से चली गई ।

लेकिन उनका मन कुछ परेसान सा था ,फिर १० मिनट मे रसोई देखने मां  चली गई की वो क्या कर रही हे और उसका चेहर भी देखना चाहती थी ।लेकिन वहाँ पहुची तो देखा की वो मछलियों का थैला निकल रही थी।

उन्होने बहुत जोर से गुस्से मे कहा यहाँ सब खाने का इंतजार कर रहे हे और तुम अभी तक मछलियाँ ही निकल रही हो कल सुबह तक बनाओगी क्या?

उसके सिर पर घूँघट अभी भी था तो चेहरा देखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था ।उन्होने उससे कहा तुम जल्दी से खाने की तैयारी करो मैं आग जबाला देती हूँ काम जल्दी हो जाएगा ।

और वे जल्दी से चूल्हा जलाने की तैयारिया करने लगी ,लेकिन साथ ही वो उसका चेहरा देखने की भी कोशिश कर रही थी । लेकिन वो जितना देखने की कोशिश करती वो और पल्लू खींच लेती। अंत मां  बोली देखो मैने आग जला दी हैं अब आगे सारा काम कर लो ।कुछ जरूरत हो तो बुला लेना  लेकिन वो फिर कुछ नहीं बोली । अब उन्हें लगा की यहाँ से जाने मे ही ठीक हैं । वरना मेरा भी समय खराब होगा और हो सकता हैं अंजान लोगों से डर रही हो । ये सब सोच कर उन्होंने उसे कहा की मैं आ रही हूँ जल्दी से खाना बना कर रखना ।और वहाँ से निकल गई,मां के मन अभी तक परेसांन ही था  कभी अपने कमरे कभी बच्चों के कभी बाहर सब को देख रही थी, कहीं कुछ अनहोनी ना हो जाए। एक मिनट भी आराम से नहीं बैठ पाई । अभी पाँच मिनट ही हुए थे पर उनके लिए वो घड़ी पहाड़ सी हो रही थी ।समय बीत ही नहीं रहा था । आठ मिनट बड़ी मुश्किल से गुज़रे और वे तुरंत ही कुछ सोच कर रसोरे की तरफ दौड़ी  और वहाँ पहुँच कर आया जैसे ही उन्होने रसोई घर का नज़ारा देखा, उनकी आँखे फटी की फटी रह गई । उनके पैर बिल्कुल ही जम गये ना उनसे आगे जाया जा रहा था ना ही पीछे , मां की धडकने रुक रही थी ! वो औरत रसोरे मे बैठ कर सारी कच्ची मछलिया खा रही थी ।सारे रसोरे में मछलियाँ और खून बिखरा पड़ा था ! उसके सिर से घूँघट भी उतरा पड़ा था ।इतना खौफनाक चेहरा आज तक उन्होने नहीं देखा था ।बाल, नाख़ून सब बढ़े हुए थे ! मछलियाँ खाने मे मगन होने की वजह से उसे कुछ ध्यान भी नहीं था । और खुशी से कभी वो आवाज़े भी निकल रही थी । हूँ हूँ सी आवाज़े गूँज रही थी ! रसोरा पिछवारे मे होने की वजह से और लोगों का ध्यान भी इधर नही आ रहा था ! माँ को भी कुछ नहीं समझ आ रहा था, कि चिल्लाने से कहीं घर के लोगों को नुकसान ना पहुचाए ।वो चुड़ैल से अपने घर को कैसे बचाए उन्हे समझ नहीं आ रहा था ।बस भगवान का नाम ही उनके दिमाग़ मे आ रहा था । अचानक वे आगे बढ़ने लगी उसकी तरफ !और  झट  से एक थाल लिया और चूल्हे की तरफ दौड़ी । उस चुरैल की नज़र भी पापा पर पड़ चुकी थी सो वो भी कुछ सोच कर उठी अपनी जगह से ! माँ कुछ भी देर नहीं करना चाहती थी, उन्हे पता था की आज अगर जरा सी भी लापरवाही हुई तो अनहोनी हो जाएगी । उस चुरैल के कुछ करने से पहले ही उन्हे चूल्हे तक पहुचना था । और चूल्हे के पास पहुँच कर उन्होने जलता हुआ कोयला थाल मे भर लिया ! और चुड़ैल की तरफ लेकर जोर से फेंका । आग की जलन की वजह से वो अजीब सी डरावनी आवाज़े निकालने लगी । अब तो उसकी आवाज़े बाहर भी जा रही थी सारे लोग बाहरसे रसोरे की तरफ भागे । वो चुड़ैल ज़ोर से हूँ हूँ जोर की आवाज़ निकल रही थी और पूरे रसोरे मे दौड़ रही थी और माता जी को पकड़ना भी चाह रही थी । लेकिन अब सारे लग रसोरे मे आ चुके थे काफी लोगों की भीड़ देख कर वो और भी डर गयी थी । लोंगों की भीड़ को थेलती हुई वो बाहर जंगल की तरफ भाग गये और सारे लोग ये मंजर देख कर डरे हुई एकसाथ  खड़े रह गई । और मन ही मन माता जी की हिम्मत की दाद दे रहे थे तो ऐसे छूटा चुरैल से पीछा ।

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