बात बहुत ही पुरानी है। जराखंड की जंगल के पास पर्वत की तलहटी में चंदनपुर नाम का एक बहुत ही सुंदर गांव था।
इस गोँव के मुखिया समसेर काका थे। सभी गोँववासी काका की बहुत ही इज्जत करते थे ओर उनके विचारो, मी को पूरी तरह मानते थे। सामसेर काका की एक ही संतान थी, चंपा। 16 साल की उम्रमे भी चंपा का नटखटपन गया नहीं था। वह बहुत ही शरारती थी, उसके चेहरे पर कहीं भी पड़ोसी का शर्मीलापन नजर नहीं आता पर हाँ उसके चेहरे से उसका भोलापन जरूर बिखरता था। उस समय हर मोँ-बाप की बस एक ही इच्छा होती थी कि उनकी लड़की को अच्छा घर-वर मिल जाए ओर वह अपने ससुराल मे खुश रहे। समसर काका भी चंपा के लिए आस-पास के गांवों लड़का देख रहा था और जाना आना शुरू कर दिए थे। एक बार पास के एक गांव के उनके मुखिया मित्र ने कहा कि उनकी नजर में एक लडका है, अगर आप तैयार
हों तो मै बात चलाऊँ? काका कहा ठीक है बात चलाओ। मुखिया मित्र ने कहा चंपा का विवाह तय हो गया। चंपा का होने बाला पति उस समय दिल्ली में कुछ काम करता था उसका नाम था प्रभास देखने मे बहुत ही सीधा- साधा ओर सुंदर युवक था। समसर काका को लड़का पसंद हो गेया था और साधी के लिए तैयार हो गेया। समसार काका ने अच्छी तरा धूम धाम साधी कर बया।
अच्छी तर्क से चंपा को विदा किया। कुछ ही दिनों मे चंपा अपने ससुराल मे भी सबकी लाडली हो चुकी थी। 1-2 महीना चंपा के साथ बिताने के बाद प्रवास भारी मनसे दिल्ली की ओर पर निकल पड़ा। चंपा ने प्रभास को समद्माया कि पैसा कमाना भी जरूरी है ओर 5-6 महीने की ही तो बात है, दिवाली में आपको फिर से घर आना ही है, तब तक मैँ नजरें बिच्छाए आपका इंतजार करलूंगी।
दिल्ली में प्रभास ने फिर से अपना काम- धंधा शुरू किया पर काम मे उसका मन ही नहीं लगता था। बार-बार चंपा का शरारती चेहरा, उसके ओंँखों के आगे घूम जाता। वह जितना भी काम मे मन लगाने की कोशिश करता उतना ही चंपा की याद आती। प्रभास की यह बेकरारी दिन व दिन बढ़ती ही जा रही थी। उसने अपने दिल की बात अपने साथ काम करने वाले अपने मित्रं को बताई। इस जगा पर सब उसके अच्छे मित्र थे। प्रभास दिन-रात अपने इन दोस्तों से चंपा की खूबसूरती ओर उसके शरारतीपन का तारीफ करता रहता। उनके मित्र चंपा के बारे मन रहकर-सुनकर उसकी खूबसूरती की एक छवि अपने-अपने मन में बना लिए थे ओर अब बार-बार प्रभास से कहते कि भाभी से कब मिलवा रहे हो। प्रभास कहता कि मैँ तो खुद ही उससे मिलने के लिए बेकरार हू पर समझ नही पा रहा हूं कि कैसे मिलूँ?
खैर अब प्रभास के दोस्तों के दिमाग में जो एक भयानक, घिनौने खिचडी पकनी सुरु हो गई थी उससे प्रभास पूरी तरह अनभिज्ञ था। दोस्तों ने एक दिन प्रभास से कहा कि यार, भाभी को यहीं ले आओ। कुछ दिन रहेगी,दिल्ली भी घूम लेगी तो उसको बहुत अच्छा लगेगा ओर फिर 1-2 हप्ते मे उसे वापस छोड़ आना। पर प्रभास ने अपने बूढ़े मोँ-बाप को यादकर कहता कि नहीं यारो, मै एेसा नहीं कर सकता, मेरी अम्मा ओर बाबू की देखभाल के लिए गोँव में चंपा के अलावा ओर कोई नहीं है।
कुछ दिन ओर बीते पर ये बीतते दिन प्रभास की बेकरारी को ओर भी बढ़ाते जा रहे थे। अब तो प्रभास का काम मे एकदम से मन नहीं लग रहा था ओर उसे बस गँव दिखाई दे रहा था। एक दिन रात को प्रभास के दोस्तों नै प्रभास से कहा कि चलो हम लोग तुम्हारे गोँव चलते है। प्रभास ने कहा अभी घर जाऊंगा तो घर बाला क्या सोचेगा। उनके दोस्तों मेँ से रंजित नाम के एक दोस्त ने कहा कि यार टेनसन मत ले। कह देना कि अभी काम की मंदी चल रही है इसलिए गाँव आ गया। ओर साथ ही इसी बहाने हम मित्र लोग भी तुम्हारा गोँव देख लेंगे ओर भाभी के साथ ही तुम्हारे माता-पितासे भी मिल लेंगे वयोकि हम लोगों का तो गोँव भी नहीं है। इसी दिल्ली में पैदा हुए ओर दिल्ली को ही अपना घर बना लिए। हम लोग भी चाहते हैँ कि कुछ दिन गेँव के नजारा के मजा लेंगे। प्रभास तो घर जाने के लिए बेकरार था ही, उसे अपने दोस्तो की बात मान ली। फिर क्या था दूसरे दिन ही प्रभास अपने उन दोस्तों के साथ अपने गांव के लिए निकल पड़ा। उसके गोँव के आस-पास मे बहुत सारे घने जंगल थे। इस पर्वतीय इलाके के वासियों के अलावा अगर आर कोई अनजाना जा जाए तो वह जरूर रास्ता भटक जाए ओर हिंसक जानवरों का शिकार बन जायेगा।
ट्रेन ओर बस की यात्रा करते-करते आखिरकार प्रभास अपने दोस्तों के साथ अपने गोँव के पास के एक छोटे से बस स्टेशन पर पहुंच गया। इस स्टेशन से उसके गोँव जाने के लिए अच्छी कच्ची सड़क भी न थी। जंगल अंदर से चलना पड़ता था , रास्ते में उबड़-खाबड कीचड़ से होकर जाना पडता था। जंगल मे चलते-चलते जब प्रभास से रंजित ने पूछा कि भाई प्रभास अभी तुम्हारा गांव कितनी दूर है ?तो प्रभास ने प्रसन्न होकर कहा कि यार अब हम लोग पहंचने ही वाले है। प्रभास की बात सुनते ही रंजित हँफने का नाटक करते हुए वहीं बैठते हुए बोला कि यार अब मुझे चला नहीं जाता। उसकी बात सुनते ही प्रभास ने कहा कि यार हम गांव के पास ही हो गेया। ओर अब 5 मिनट भी नहीं लगेगे। पर प्रभास की बातों को ध्यान में रखते हुए उसके अन्य दोस्त भी रंजित के पास ही बैठ गए। अब प्रभास बेचारा भी क्या करे, उसे भी रूकना पडा। प्रभास के रूकते ही रंजित ने अपने हाथ में लिए बैग में से एक अच्छी नई साड़ी ओर साथ ही चूड़ी आदि निकालते हुए कहा कि यार प्रभास, हम लोग भाभी से पहली बार मिलने वाले है, इसलिए उसके लिए कुछ उपहार लाए है। उसकी बात सुनते ही प्रभास ने कहा कि यारो इसकी क्या जरूरत थी। पर रंजित ने हंसकर कहा कि जरूरत थी भाई, हमारी भी तो भाभी है, हम पहली बार उससे मिलने जा रहे है, तो बिना कुछ दिए कैसे रह सकते हैँ। इसके बाद रंजित ने कुटिल मुस्कान चेहरे पर लाते हुए प्रभास से कहा कि यार प्रभास, क्यो न भाभी को सरप्राइज दिया जाए। एक काम करो, तुम घर जाओ ओर बिना किसी को बताए भाभी को घुमाने के बहाने यहाँ लाओ, हम लोग यहाँ भाभी को यह सब उपहार दे देगे ओर उसके बाद फिर से तुम दोना के साथ तुम्हारे घर चल चलेगे। भोला प्रभास हाँ मे हाँ मिलाते हुए तेज कदमो से घर की ओर गया ओर लगभग 30-40 मिनट के बाद चंपा को लेकर दोस्तो के पास वापस आ गया। फिर क्या था, चंपा से प्रभास के दोस्त एकदम से अपनी भाभी की तरह मिले। चंपा को भी बहुत अच्छा लगा। इसके बाद जब चंपा ने उन्हें घर चलने के लिए कहा तो अचानक उनके तेवर थोडे से बदले नजर अये।
रंजित ओर प्रभास के अन्य दोस्त चंपा ओर प्रभास के पास में खड़े हो गए थे। चंपा ओर प्रभास कुछ समझ पाते इससे पहले ही रंजित ने दांत भीजते हुए तेज आवाज मे प्रभास से कहा कि साले, मै अपनी बहन की शादी तुमसे करना चाहता था पर तुम बिना बताए गांव आकर अपनी साधी कर ली । उसकी बात सुनकर प्रभास ने भोलेपन से कहा कि रंजित भाई, आपने तो कभी हमसे अपनी बहन की शादी के बारेमे बात भी नहीं की थी ओर जब मैँ घर आया था तो यहाँ माँ बाबा ने शादी करा दिया था। भला मैँ उन्हं मना कैसे कर सकता था। पर प्रभास की इन भोली बातों का उन के दोस्तो पर कोई असर नहीं हुआ। उनमें से दो ने प्रभास को कसकर पकड़ लिए थे ओौर एक चंपा के साथ जबरदस्ती करने लगे थे। अभी प्रभास या चंपा चिल्लाकर आवाज लगा पाते इससे पहले ही उन दोनों के मुंह मे कपड़े ठुस दिए गए। फिर निवस्त्र चंपा को दोस्तो ने उठाकर घने जंगल मे ले गए। घने जंगल्मे ले जाकर उन लोगों ने प्रभास की हत्या कर दी ओर चंपा की इज्जत लूट ली।बो सब नरपिशाच घंटा तक चंपा को इज्जत लुटते रहे, वह चिल्लाती रही, भीख मोँगती रही पर उन भेडियों पर कोई असर नहीं हुआ।पेड़ पाकर के क्षमा मांग फिरबी उन पापी ओ ने चंपा को भी मौत के घाट उतारकर वहीं जंगल मे सुखी पत्तियों मे उन्हे ठेककर आग जला कर उसके शरीर का निशान मिटा दिया।
आग लगाने के बाद उनके ये दोस्त जिधर से आए थे, उधर को भाग निकले। जंगल जलने लगा ओर जलने लगे चंपा ओर प्रभास के जिस्म। सब कुछ स्वाहा हो गया था। इस आग से आस-पास के गोँववालों को कुछ भी लेना देना नहीं था, क्योकि जंगल में आग लगना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। कभी भी कोई भी अपनी अप आग लग जाते हे ।
धीरे-धीरे समय बीतने लगा। रात तक जब चंपा ओर प्रभास घर नहीं आए तो प्रभास के पिताजी ने प्रभास के आने ओर चंपा को लेकर जाने की बात अपने पड़ोसियों को बताई। उसी रात को उनके कुछ पड़ोसी मशाल लेकर चंपा ओर प्रभास को खोजने निकल पडे। काफी देर तक खोजने के बाद भी इन दोनों का पता नहीं चला। दूसरे दिन सुबह पुलिस मे खबर दी गई पर पुलिस भी क्या करती। थोडा-बहुत छानबीन की पर उन का कोई पता नहीं। अब के मोँ-बाप ओर गोँववालों को लगने लगा था कि प्रभास अपनी बीबी को लेकर बिना बताए दिल्ली चला गया। शायद उसे डर था कि अगर बाबा को बताकर ले तो उनके माता पिता जाने नहीं देते। आखिर दिल्ली में प्रभास को रहता है, क्या करता है, इन सब बातों के बारे मे भी प्रभास के माता-पिता ओर गोँववालों को बहुत कम ही पता था। धीरे-धीरे करके १०-११ महीने बीत गए। अब प्रभास के पिता बिना प्रभास ओर चंपा के जीना सीख गए ।
इधर दिल्ली में एक दिन अचानक रंजित के घर पर कोहराम मच गया। हुआ यह था कि किसी ने बहुत ही बेरहमी से उसके गुप्तांग को दात से काट दिया था, उसके शरीर पर जगह-जगह भयानक दांत के निशान भी पडे थे ओर कुछ दिनो के बाद इस दुनिया को विदा कर गया था। रंजित के घरबाला ने बता रहा था 1 महीने से रंजित का किसी लड़की के साथ चक्कर था। वे दोनों बराबर एक दूसरे से मिलते थे पर लडकी कौन थी, कैसी थी, किसी ने देखा नहीं था। पर इसी दौरान पुलिस को रंजित की बहन से एक अजीब व डरावनी बात पता चली। रंजित की बहन ने बताया कि एक दिन जब रंजित घर से निकला तो वह भी पीछे पीछे गया और बो बस्ती से निकलकर एक सुनसान रास्ते मे बनी एक पुल पर बैठ गया था। वहाँ से में लगभग २० मीटर की दूरी पर एक बिजली के खंभे की आड मे खडा होकर उसपर नजर रख रही थी। मुझे बहुत ही अजीब लगा क्योकि एेसा लग रहा था कि रंजित किसी से बात कर रहा है, किसी को कुछ कह रही है पर वहाँ तो रंजित के अलावा कोई था ही नहीं। फिर मुझे लगा कि कहीं रंजित भाई पागल तो नहीं हो गए हे। अभी मै यही सब सोच रही थी तभी एक भयानक, काली छाया मेरे पास आकर खडी हो गई। वह छाया बहुत ही भयानक थी पर छाया तो थी पर छाया किसकी है, यह समझ मे नहीं आ रहा था। मैं पूरी तरह से डर गई थी। फिर अचानक वह छाया मुझसे बाते करने लगी ओर चिल्लाई, “अब तेरा भाई नहीं बचेगा। नोचा था न मुदे, मै भी उसे नोच-नोचकर खा जाऊँगी। ओर हाँ एक बात तूं याद रख, अगर यह बात किसी को भी बताई तो मैँ तेरे पूरे घर को बरबाद कर दूगी।“ इतना कहते ही रंजित की बहन जोर जोर से रोने लगी।
इतना सुनते ही पुलिस ओर आस-पास जितना लोग थे सब पूरी तरह से डर गए। क्योकि रंजित का जो हाल हुआ था, वह यह बयोँ कर रहा था कि इसके साथ जो हआ है वह किसी इंसान ने नहीं कही प्रेत ने ही किया होगा।सायद चंपा की आत्मा ही होगी जो मरकर बदला ले रही थी उसके और भी दोस्त इसी में सामिल था उनका भी इसी हाल होगा जरूर।भगवान चंपा के आत्मा को शांति दे अहि कामना हे।

