गांवमें भूत की सच्ची स्टोरी
यह जो स्टोरी अभी बताने वाला हूं मेरेेे प्यारे दोस्तों यह अपना खुद का गांव का एक सच्ची कहानी हे यह बात है उस टाइम का जब साल 1991 था, मैं बहुत छोटा था मेरा उमर उस टाइम 5 साल के थे , मेरेेेे एक बड़े भाई और मेरे एक बड़ी बहन भी थे। मैं घर का छोटा होनेे के बजे से मुझे बहुत प्यार मिलता था। मुझे कभी भी किसी भी सामान का कमी महसूस नहीं हुआ। गांव में 70% एरिया बांस का बन में घेरा हुआ था। गांव में खेतीवाड़ी छोड़कर दूसरा कुछ काम नहीं था लोगों का ,इसी वजह से शाम होते ही सब अपना अपना घर में घुस जा रहा था गांव भी अंधेरा में छा जा रहा था क्योंकि गांव में उस टाइम इलेक्ट्रिसिटी का कोई नाम और निशाना नहीं था। गांव में शाम को टाइम केरोसिन का दो चार लैंप छोड़़कर बाकी गांव कालेेे अंधेरा छायाा हुआ था। मेरााा जो गांव है यह पश्चिम बंगल का वर्धमान जिला में है ,गांव का नाम बामापुकुर है।्न्न्न््न्न्न्न्््न्न्न््न्न्नअभी गांव का बात कुछ अलग ही है क्योंकि अभी इलेक्ट्रिसिटी का जमाना है और गांव भी अभी बहुत डिवेलप हो गया। मेरे घर से मेरे मामा का घर 4 -5 किलोमीटर की दूरी पर है। मामा के गांव तो बहुत ही डेंजर है क्योंकि सबको पता है दिन के समय भी मामा के गांव में भूत दिखाई देता है। इसी वजह से हम लोग उनके गांव में जाने से हमेशा डरते थे। गांव देखना जितना खूबसूरत है उतना ही डरावना भी है। गांव की चारों साइड में झील और झील है आसपास में खेतिया और रास्ते के साइड में ताल नारियल और खजूर का पेड़ है। गांव में एक चीज बहुत ज्यादा था हर दश मीटर दूरी पर सिमुलतुला के पेड़ था। गांव का लोग हमेशा बोलते थे उस तुला का पेड़ में ही भूतों का वास था। हमने कभी देखा नहीं लेकिन शाम को टाइम में जब कभी भी मामा के घर में जाते थे तब डर का महसूस किया था बहुत बार। हमेशा लग रहा था पीछे से कोई आ रहा है लेकिन जब भी पीछे मुड़ के देखा कुछ भी नहीं था कभी भी। हालात ही मैंने कभी भी अकेला नहीं गया जब भी जा रहा था तब मेरे बड़े भाई और बड़ी बहन के साथ ही जा रहा था। एक दिन शाम 6:00 बजे मामा के गांव से एक आदमी जो हमारा रिश्तेदारी होगा वह आके बोल कर गया दादी का तबीयत खराब है इसलिए हम सबको मामा का घर में जाने के लिए। लेकिन उस दिन बाबा और मां घर पर नहीं थे उन लोग दूर शहर में मार्केटिंग के लिए गए थे और आया भी नहीं था उस टाइम कहीं टेलीफोन वी नहीं थे जो हम लोग कॉल करके बुला देते। हम लोग और ज्यादा टाइम अपेख्या ना करके जाने के लिए तीनों मिलकर तैयार हो गया ।में तो जाने के लिए मना कर रहा था लिकिन बड़े भाई और बेहेन की बात टाल नहीं पाया।शमको 6 बज गए थे अंधेरा हो गए थे और उस टाइम सर्दी के मौसम थे इसीलिए बहत जल्दी शाम ढल गए।मामा के घर जाने के जो रास्ता था सब कच्चा सड़क थे इसीलिए बेल गाड़ी घोड़े के गाड़ी और साइकल छोड़कर और कुचवी नहीं था।हम तीनो पैदल ही चलके घरसे निकाल गया।दो किलोमीटर जाने के बाद ही पूरा अंधेरा छा गए।रास्ता थोड़ा थोड़ा दिखाए दे रहा था बहुत डर लग रहा था जाने के लिए ।मामा के गांव के पास में चला गए लिकिन आगे बढ़ नहीं पाया डर की वजह से। गांव का पहले आदिवासी का गांव पड़ता है उसके साइड में एक झील है और झील के किनारे पर ऊंचा डीपी और खजूर का पेड़ है । जो ऊंचा ऊंचा डीपी है उस पर आदिवासी लोग मरने के बाद वहीं पर कबर देता है। उस दिन जब उस झील के पास से गुजर रहे थे तब हम तीनों ने जो देखा वह कभी भूल नहीं पाएंगे। आज भी उस बात को याद करने से रात को डर का महसूस होता है। हम तीनों मिलकर जब उस झील के साइड से जा रहा था तब देखा उस लाइन वाला खजूर का पेड़ जो था उसका ऊपर सफेद कलर का दो औरत एक साथ मिलकर पेड़ का ऊपर खड़ा होकर बातचीत कर रहा है। हमको तो कुछ सुनाई नहीं दिया लेकिन दूर से महसूस कर पाया। उस नजारा को देखकर हम तीनों आंखें बंद कर दौड़ने लगा और एक ही दौड़ में मामा के घर चला गया। जब मामा के घर में गया तो आसपास के लोग भी हमको देख कर उसके घर पर आ गया और पूछने लगा क्या हुआ हमने जब बताया इस घटना के बारे में तब सब मिलकर हमारा तारीफ किया हुआ है लेकिन हमारे हालत तो हम खुद को पता है क्या हुआ। सबको पता था उस झील के किनारे से दिन में जाने से भी कुछ ना कुछ दिखाई देता है। मामा के घर पर जाने के बाद दादी से मीट किया दादी का तबीयत बहुत ही खराब था। इसे खराब तो मेरी बड़ी बहन का हो गया वह घर पर जाने के बाद बेहोश हो गया। मामा और मामी भी आ गया उन लोगों कुछ समझ में आया इसीलिए पानी मुंह का ऊपर छिड़कने लगा लेकिन कुछ असर नहीं पड़ा कुछ टाइम के बाद मेरी दादी ने बिस्तर से ही बोलने लगा इसको जूता को सुगाने के लिए लेकिन सु गाने के बाद भी कुछ असर नहीं पड़ा। बाद में मेरे दादाजी दूसरे गांव से एक पंडित को बुलाया वह कुछ झाड़ फुक किया इसके बाद मेरी बड़ी बहन ठीक हो गया। अगले दिन ही बाबा और मां आ गया और हम तीनों को लेकर घर चले आए। उसी दिन के बाद से हमने दोबारा मामा के घर के बारे में भी सोचा नहीं। अभी का टाइम में थोड़ा सा सुधर गया गांव में इलेक्ट्रिसिटी भी हो गया और गांव में जनसंख्या भी बहुत हो गया इसलिए अभी उतना डर नहीं लगता है फिर भी रात के टाइम में अभी भी जाओगे तो जरूर कुछ ना कुछ तो देखोगे ।
Tags : भूत का स्टोरी

Wowww superb story..
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